वह दौर जब स्टुडियो पद्धति ने हिंदी सिने जगत पर गहरा प्रभाव डाला
वह दौर जब स्टुडियो पद्धति ने हिंदी सिने जगत पर गहरा प्रभाव डाला
उन दिनों प्रभाव, बांबे टॉकीज और न्यू थियेटर्स भारत के प्रमुख स्टूडिओ थे और ये प्रायः गंभीर किंतु मनोरंजक फ़िल्में बनाकर दर्शकों का मनोरंजन किया करती थीं। ये तीनों स्टुडिओ देश के बड़े बैनर्स कहलाते थे। उन दिनों सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली, धार्मिक तथा पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम से संबंधित फ़िल्मों का निर्माण हुआ करता था और उन्हें बहुत अधिक पंसद भी किया जाता था। उस समय के कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय फ़िल्में हैं-वी. शांताराम की फ़िल्म 'दुनिया ना माने', फ्रैंज ओस्ट की फ़िल्म 'अछूत कन्या' दामले और फतेहलाल की फ़िल्म 'संत तुकाराम', मेहबूब खान की फ़िल्में 'वतन', 'एक ही रास्ता' और 'औरत' आर्देशिर ईरानी की फ़िल्म 'किसान कन्या' शांताराम की 'डॉ. कोटनीस की अमर कहानी', मेहबूब खान की 'रोटी', चेतन आंनद की 'नीचा नगर', दया शंकर की 'कल्पना', ख्वाजा अहमद अब्बास की 'धरती के लाल', सोहराब मोदी की 'सिकंदर', 'पुकार' और 'पृथ्वी वल्लभ', जे.बी.एच. वाडिया की 'कोर्ट डांसर', एस.एस. वासन की 'चंद्रलेखा', विजय भट्ट की 'भरत मिलाप' और 'राम राज्य', राजकपूर की 'बरसात' और 'आग' उन दिनों की अविस्मरणीय फ़िल्में हैं।
आरंभ में स्टुडिओ पद्धति का प्रचलन रहा। प्रत्येक स्टुडिओ के अपने वेतनभोगी निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, नायक, नायिका तथा अन्य कलाकार हुआ करते थे। पर बाद चलचित्र निर्माण में रुचि रखने वाले लोग स्वतंत्र निर्माता के रूप में फिल्म बनाने लगे। इन स्वतंत्र निर्माताओं ने स्टुडिओ को किराये पर लेना तथा कलाकारों से ठेके पर काम करवाना शुरू कर दिया, चूँकि ठेके में काम करने में अधिक आमदनी होती थी, कलाकारों ने वेतन लेकर काम करना लगभग बंद कर दिया। इस प्रकार स्टुडिओ पद्धति का चलन समाप्त हो गया और स्टुडिओ को केवल किराये पर दिया जाने लगा।

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