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    ग्राहकता


    ग्राहकता 

    विद्यालय की शिक्षा समाप्त कर लौटे एक नवयुवक को अपने ज्ञान का बड़ा अभिमान हो गया। कोई भी आता वह किसी को भी नमस्कार नहीं करता था, उसे अहंकार था कि अब मुझे सीखने के लिए कुछ रहा ही नहीं। इस अभिमान में वह अपने माता-पिता की भी अवज्ञा करता।

    पिता बड़ा चतुर था उसने जान लिया कि मति-भ्रम बेटे की अहंकार से उबारा न गया तो उसका विकास रुक जाएगा। वह एक दिन अपना सर्वनाश कर लेगा।

    सो एक दिन घर से थोड़ी चीनी ली और उसे धूल में मिलाकर घर के एक कोने में पटक दी। पिता जब वहाँ से चला गया तो घर के छोटे लड़कों ने सोचा धूल से निकाल कर चीनी खानी चाहिए पर मुश्किल यह थी कि धूल से चीनी के कण ढूंढ़ निकालना कठिन था। लड़कों ने सोचा बड़े भैया बहुत विद्वान हैं, उन्हें जरूर कोई ऐसी विद्या आती होगी जिससे इस चीनी को धूल से अलग किया जा सके। बालकों ने जाकर निवेदन किया तो वे ऐंठते हए वहाँ पहँचे भी पर ढेर में चीनी ऐसे मिल गई थी कि उसे देखते ही उनकी अकल गुम हो गई। कई उपाय किए पर तोले भर चीनी भी नहीं निकाली जा सकी।

    जितनी युवक की खीझ बढ़ती उतना ही छोटे बच्चे हँसते और उनके अहंकार को अगूंठा दिखाते। हारकर युवक वहाँ से भाग गया और शाम तक किसी को दिखाई न दिया।

    सायंकाल पिताजी भी आए और पुत्र जी भी। ढेर के पास से गुजरे तो वह आश्चर्यचकित थे कि धूल के ढेर से सारी चीनी गायब थी। पिता ने छोटे-छोटे लड़कों को बुलाया और डाँटकर पूछा"इसकी चीनी कौन निकाल ले गया।"

    लड़कों ने कहा-"पिता जी वह तो सब चींटियाँ चन ले गई।" युवक यह सुनते ही हैरान रह गया। जो काम वह घंटों की परेशानी के बाद भी नहीं कर सका उसे चींटियाँ इतनी आसानी से कर गई।

    युवक का सारा अहंकार गल गया। उसने सोचा यदि चींटी जैसी गुण ग्राहकता से हम भी वंचित न हुए होते तो अब तक कितनी उन्नति कर गए होते।