भाव की भूख
भाव की भूख
यहदी अनपढ़ था और ग्रामीण भी। किसी ने उसे बता दिया कि जिस दिन प्रायश्चित पर्व हो उस दिन खूब अच्छा-अच्छा खाना चाहिए और मिले तो शराब भी पीनी चाहिए। सो जब अगला 'प्रायश्चित पर्व' आया तो एक दिन पूर्व ही उसने खूब डटकर खाया, शराब पी और नशे में धुत्त हो गया।
प्रात:काल नींद टूटी तो भोले-भाले ग्रामीण यहूदी ने देखा कि उसका साथी तो प्रायश्चित पर्व की लगभग आधी प्रार्थना पूरी कर चुका है। उसे तो एक भी मंत्र याद न था, सो उसे अपने आप पर भारी ग्लानि हुई। कल शराब न पीकर मंत्र याद कर लेता तो कितना अच्छा होता, यह सोचकर वह बड़ा दुखी हुआ।
सबको प्रार्थना करते देखकर वह वहीं बैठ गया और वर्णमाला __ के अक्षरों का ही पाठ करता हुआ भावना करने लगा--"हे प्रभु! मुझे तो कोई मंत्र याद नहीं, इन अक्षरों को जोड़कर तुम्हीं मंत्र बना लेना। मैं तो तुम्हारा दास हूँ, पूजा के लिए नए भाव कहाँ से लाऊँ?" जब तक दूसरे लोग प्रार्थना करते रहे, वह ऐसे ही भगवान का ध्यान करता रहा।
सायंकाल जब वे दोनों सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित हुए तो धर्मगुरु रबी ने उस ग्रामीण को भक्तों की अग्र-पंक्ति में रखा। यह देखकर उसके साथी ने आपत्ति की "श्रीमान जी! इसे तो मंत्र भी अच्छी तरह याद नहीं।"
"तो क्या हुआ" रबी ने आर्द्र कंठ से कहा- "इनके पास शब्द नहीं, भाव तो हैं। भगवान तो भाव का ही भूखा है, मंत्र तो हमारे-तुम्हारे लिए हैं।"

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