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    प्रश्न--ओशो आप जो अराजकता और इस प्रकार की बातें करते हैं, इसमें जो मर्डर होते हैं, तो इसे बंद करना चाहिए न?

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    प्रश्न--आप जो अराजकता और इस प्रकार की बातें करते हैं, इसमें जो मर्डर होते हैं, तो इसे बंद करना चाहिए न?

    ओशो--मेरा मनाना यह है कि यह हंगामा, यह मर्डर, यह इलूजन जो है, यह बहुत दिनों तक समाज को सप्रेस करने या रोकने का परिणाम है। यह अराजकता का परिणाम नहीं है। जैसे एक आदमी को हम बीस दिन खाना न दे, उपवास पर रख दें। और फिर कहें कि इसको खाने के लिए मुक्त करो। और वह आदमी किचन में पहुंचकर एकदम खाने पर टूट पड़े, और बर्तन तोड़ दे, और पटक दें, और खाए--इतना खाए कि बेहोश होकर गिर जाए, तो आप कहेंगे कि देखो, यह खाने का कैसा दुष्परिणाम हुआ! मैं कहूंगा, यह खाने का दष्परिणाम नहीं है, यह बीस दिन के उपवासों का परिणाम है। जो तोड़-फोड़ होती है, वह अराजक चित का परिणाम नहीं है। वह अराजक चित्त के विपरीत, जो हजारों सालों का परंपरागत चित है, उसमें जो रुकावटें लगायी थी, उसका परिणाम है। यह होगा संक्रमण के काल में। एक ट्रांसफार्मेशन का पीरियड होगा। यह होगा। लेकिन अगर दुनिया राजी हो गयी, धीरे-धीरे मनुष्य का चित्त इस बात के लिए राजी हआ है कि बहत बंधन, बहत नियम, बहुत रूढ़ियां नहीं चाहिए। तो एकदम तोड़-फोड़ मिट जानेवाली है, क्योंकि वह उनकी प्रतिक्रिया में पैदा होती हैं, वह सीधी पैदा होती हैं। मेरी अपनी समझ यह है कि पश्चिम में जो इतने जोर से सेक्सुअलिटी बढ़ी है, वह क्रिश्चियानिट के कारण बढ़ी है, क्योंकि क्रिश्चियनिटी न सेक्स के खिलाफ इतना सख्त रुख लिया कि उसको आप मान लिया। 

    प्रश्न--अभी सेक्स क्या होमोसेक्सुअलिटी तक पहुंचेगी? 

    ओशो--मैं भी मानता हूं, गलत नहीं है। अगर किसी आदमी को होमोसेक्सुअलिटी से सुख मिलता हो, तो समाज को रोकने का हम क्या है? और अगर दो आदमी राजी हों, तो हम क्या है किसी को रोकने का?

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