कुंदन लाल सहगल का दौर - जिसे हिंदी सिनेमा का पहला स्टार कहा गया
कुंदन लाल सहगल का दौर - हिंदी सिनेमा का पहला स्टार
लाहौर, अमृतसर और पुरानी दिल्ली की ही तरह पुराने जम्मू शहर की हर गली का अलग नाम और इतिहास है। ऐसा ही है जम्मू शहर का लिंक रोड चौक, जो अब के. एल. सहगल चौक के नाम से जाना जाता है। इसी चौक से पांच कदम की दूरी पर वह घर है जहाँ जम्मू के महाराज प्रताप सिंह के तहसीलदार अमरचंद के घर चौथे बच्चे ने
जन्म लिया था। बॉम्बे शोरूम के मालिक पविंदर वह कमरा दिखाते हैं, जहाँ सहगल का जन्म हुआ था। अब उस मकान में सुशील गुप्ता अपने परिवार के साथ रहते हैं। सुशील बताते हैं, मैंने 1972 में यह मकान खरीदा था। कहते हैं कि दायीं तरफ के इस कमरे में अमरचंद पत्नी और पांच बच्चों के साथ किराए पर रहते थे।
पंजाबी साहित्यकार दर्शन कौर बताती हैं, कुंदनलाल ज्यादा पढ़ नहीं सके। वे माँ केसर बाई के साथ भजन और कीर्तन मंडलियों में अक्सर जाया करते थे। माँ ही सही मायने में उनकी मार्गदर्शक बनीं। युवा सहगल को अभिनय के लिए पहला मंच जम्मू में ही मिला था। वे ऐतिहासिक दीवान मंदिर में होने वाली रामलीला में सीता बनते थे। पिता को इससे सख्त नफ़रत थी। इसलिए सहगल को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए रेलवे में टाइम कीपर की नौकरी करनी पड़ी। यहाँ भी वे ज्यादा दिन नहीं ठहरे और रेमिंगटन टापइराइटर कंपनी में सेल्समैन के तौर पर काम करने लगे, जिसने उन्हें विभिन्न शहरों में घूमने का मौका दिया। यहीं से वे लाहौर पहुंचे, जहाँ उनकी मुलाकात मेहरचंद जैन से हुई। दोनों अच्छे मित्र बने और एक साथ कलकत्ता के मुशायरों में हिस्सा लेने लगे। मेहरचंद ने बाद में शिलांग में असम सोप फैक्ट्री खोल ली और कुंदनलाल का मन कलकत्ता के सिने जगत में रमने लगा। मेहरचंद जैन के प्रोत्साहन और कलकत्ता के माहौल ने सहगल को गायकी के क्षेत्र में एक उभरता हुआ सितारा बना दिया।
यह 1930 का दशक था, जब बी.एन. सरकार के स्टूडिओ न्यू थियेटर में 200 रुपए प्रति माह पर सहगल ने पहला कॉन्ट्रैक्ट साइन किया। उसके बाद इंडियन ग्रामोफोन कंपनी ने हरीशचंद्र बाली की कम्पोजीशन में सहगल के पंजाबी गीतों का संग्रह रिलीज़ किया। सहगल अभिनीत फ़िल्म 1932 में आई 'मोहब्बत के आँसू'। इसी साल 'सुबह का सितारा' और 'जिंदा लाश' भी रिलीज़ हुई, लेकिन ये तीनों फ़िल्में कोई खास कमाल नहीं दिखा सकीं। उसके बाद 1933 में आई फिल्म 'पूरण भगत'। इसमें उनके गाए चार भजनों ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। फिर 'यहूदी की लड़की', 'चंडीदास', 'रूपलेखा' और 'कारवां-ए-हयात' जैसी फ़िल्मों ने सहगल को चर्चित कर दिया। 1935 में बनी भारतीय सिनेमा की दूसरी देवदास और हिंदी की पहली, जिसने सहगल को हिंदी सिनेमा का पहला स्टार बना दिया। इस फ़िल्म में गाए उनके गीत 'बालम आए बसो मोरे मन में...' ने युवा दिलों में खलबली मचा दी। न्यू थियेटर की प्रोडक्शन में सहगल ने सात DVD बांग्ला फ़िल्मों में भी किया किया। सहगल उन कलाकारों में से थे, जिन्होंने सिनेमा का कलकत्ता से मुंबई स्थानांतरण देखा था। दिसंबर 1941 में सहगल भी मुंबई आ गए। यहाँ उन्होंने कई हिट फ़िल्में और कई सुपरहिट गीत दिए। सिनेमा और सफलता की चकाचौंध के बीच पाने की बीमारी ने हिंदी सिनेमा के पहले देवदास को अपनी चपेट में ले लिया और 18 जनवरी 1947 में हिंदी सिनेमा के पहले स्टार का अंत देवदास की राह पर हो गया।
जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी का के.एल. सहगल हॉल जम्मू की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका है, लेकिन सहगल चौक पर स्थापित सहगल स्मारक का हाल कुछ और ही बयां करता है। पविंदर कहते हैं, हम अगर अपनी यादों को नहीं संजा सकते, यहाँ की प्रतिमाओं का सम्मान नहीं कर सकते, तो फिर शहर का विकास बेमानी है। वे सहगल के खस्ताहाल स्मारक की ओर इशारा करते हुए गत गाते हैं, 'जब दिल ही टूट गया...' फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ। आजादी के बाद जहाँ एक तरफ़ भारतीय सिनेमा ने देश के सामाजिक यथार्थ को गहराई से पकड़कर आवाज़ देने की कोशिश की, वहीं लोकप्रिय सिनेमा ने व्यावसायिकता का रास्ता अपनाया। एक तरफ़ पृथ्वीराज कपूर, महबूब खान, सोहराब मोदी, गुरुदत्त जैसे फ़िल्मकार थे तो दूसरी तरफ सत्यजित राय जैसे फ़िल्मकार।
सत्तर के दशक तक सिनेमा के मूल में प्रेम, फंतासी और एक कभी न __ हारने वाले सुपर नैचुरल हीरो की परिकल्पना रही। कहानियों में कुछ न कुछ संदेश देने की भी कोशिश हुई लेकिन बहुत ही अव्यावहारिक तरीके से। सत्तर और अस्सी के दशक में कुछ फ़िल्मकारों ने महसूस किया कि सिनेमा जैसे सशक्त संचार माध्यम से जोडने और अन्याय के खिलाफ एक कलात्मक अभिव्यक्ति के तौर पर किया जाए। यही समानंतर सिनेमा का दौर था और इस दौरान 'अंकुर', 'निशांत', 'अर्धसत्य' जैसी फ़िल्में बनी।


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