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    प्रश्न--ओशो, जे कृष्णमूर्ति और आपके विचार कहां तक मिलते हैं?

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    प्रश्न--ओशो, जे कृष्णमूर्ति और आपके विचार कहां तक मिलते हैं? 

    मिल सकते हैं, बहत से विचारों से मिल सकते हैं। दुनिया में किसी समझदार आदमी का किसी फालोंअर से खयाल नहीं रहा--कभी नहीं। लेकिन फालोअर सभी को मिल जाते हैं--जे कृष्णमूर्ति को भी और सबको भी। विचार मेल खा सकते हैं बहुत से। सच तो यह है कि अगर मैं कुछ जान रहा हूं, तो यह हो नहीं सकता कि वह दूसरे जाननेवालों से मेल न खाता हो। यह हो ही नहीं सकता। अगर मैं जान रहा हूं, तो वह मेल खाएगा ही। यह हो सकता है कि युग बदलते हैं, भाषा बदल जाती है, शब्द बदल जाते हैं, कहने के ढंग बदल जाते हैं। और फिर एक-एक व्यक्ति का अपना-अपना माध्यम होता है। बुद्ध और महावीर एक साथ थे बिहार में, और कई बार ऐसा हुआ, एक ही गांव में ठहरे, और एक बार तो ऐसा हआ कि एक ही धर्मशाला के आधे हिस्से में बुद्ध ठहरे हुए थे और आधे मग महावीर ठहरे थे। और दोनों ही बड़ी उल्टी बातें बोलते हए मालूम पड़ते हैं। लेकिन दोनों बिलकुल एक ही बात बोल रहे हैं। मुझसे किसी ने पूछा कि जब एक गांव में और एक ही धर्मशाला में बुद्ध और महावीर ठहरे थे, तो मिले क्यों नहीं? तो मैंने कहा, मिलने की कोई जरूरत न थी। मिलने की जरूरत वहीं होती है, जहां कुछ भेद हो। वहां कोई भेद न था, मिलने की कोई जरूरत न थी। शब्द बिलकुल अलग-अलग हैं और बहुत उल्टे भी हैं। महावीर कहते हैं कि आत्मा को पा लेना सबसे बड़ा ज्ञान है, बुद्ध कहते हैं कि आत्मा को मानने से बड़ा अज्ञान नहीं है। उनके कहने का तरीका बिलकुल भिन्न है। महावीर कहते हैं आत्मा को पा लेना सबसे बड? ज्ञान है। लेकिन बुद्ध कहते हैं कि तुम नहीं हो आत्मा। तुम अहंकार हो, उसको छोड़ दो, उसको नष्ट हो जाने दो, तो आत्मा मिल जाएगी। और बुद्ध आत्मा से ही इनकार करते हैं। वे कहते हैं--आत्मा को छोड़ दो, तो वह मिल जाएगा जो है, और तब कोई दिक्कत नहीं रहेगी। असल में दुनिया में जिन्होंने जो कुछ कभी जाना हो, उनके शब्दों में रती भर का कोई भेद नहीं हो सकता है--होने का कोई उपाय नहीं है। अगर भेद दिखता है, तो वह हमें दिखता है। हमारे पास सिर्फ शब्द होता है, अनुभूति नहीं होती है। और शब्द में भेद हो सकते हैं। अनुभूति में कोई भेद नहीं है। हम कहने जाते हैं तो भेद शुरू हो जाते हैं। लाओत्से ने जिंदगी भर नहीं लिखा कुछ। बहुत लोगों ने कहा कि लिखो। उसने कहा, पहले बहुत लोग लिख चुके हैं, क्या उससे कुछ फायदा हुआ? अगर उससे कोई फायदा नहीं हुआ, तो मुझसे और क्यों कागज खराब करवाते हो? मैं नहीं लिखता। अस्सी वर्ष का हो गया तो चीन छोड़कर जा रहा था। तो चुंगी पर रोक लिया गया चीन के। कहा मैं लिखे देता हूं लेकिन जो मैं जानता हूं, उसमें पहली बात यह कि लिख नहीं सकता और दूसरी बात, अगर किसी तरह कोशिश भी करूं, तो तुम कभी पढ़ नहीं पाओगे। तुम वही पढ़ सकते हो, जो तुम जानते हो। उससे ज्यादा तुम कैसे जानोगे? और मुझे एक आदमी दिखाई नहीं पड़ता, जो मेरी किताब पढ़कर जान लेगा--तो क्यों मेहनत करवाते हो? लेकिन उसकी बात नहीं मानी गयी। तो उसने एक किताब लिखी है--ताओ तेह किंग। एक छोटी सी किताब है यह। इससे छोटी किताब नहीं है दुनिया में और इससे कीमती किताब भी ही है। कीमती इस लिहाज से कि पहला वाक्य उसने लिखा, कि मुझे बड़ी दिक्कत में डाल रहे हो। सत्य कहा नहीं जा सकता। और मैं कहने जा रहा हूं। और जैसे ही कहा जाता है, वैसे ही सब गड़बड़ हो जाता है। तो वह जो जानता है, वह इतना बड़ा है और शब्द इतना छोटा है कि जैसे कोई सागर को जाने और एक प्याली में भरकर आ जाए घर, तो जो घर ले आए उसे किसी को बताए कि यह सागर है तो प्याली में देखे वह सागर को, तो जितना जान ले उतना भी शब्द में नहीं जाना जा सकता। लेकिन जो भी जीवन में कभी जाना है, वह एक ही है, वह दो हो नहीं सकता। शब्द बदलते रहेंगे, रोज बदलते रहेंगे। गीता में जो है, कुरान में जो है, बाइबिल में जो है, महावीर में, बुद्ध में वह यह है कि हम जानें, तो ही खयाल में आता है, नहीं तो नहीं आता। और उसे अगर पाना हो, जानना हो, तो किसी को पकड़ मत लेना--महावीर को या बुद्ध को या कृष्णमूर्ति को, मुझको या किसी को भी। पकड़ा कि खो गया। पकड़े कि बाकी चीज पकड़ ली और गए। तो सारी चेष्टा यह नहीं है कि मैं आपको कहकर कुछ समझा दूंगा। कहने की सारी चेष्टा यह है कि शायद थोड़ी सी बेचैनी आप में हो जाए। और उसमें एक गति शुरू हो जाए और आप चल पड़ें, तो यात्रा शुरू हो जाए। तो यह जो आप कहते हैं, चैनेलाइज नहीं कर रहा हूं। 

    प्रश्न--यह जो आप बोल रहे हैं, इसका कोई लक्ष्य तो है न?

    ओशो--बिलकुल नहीं। नहीं आनंद जी, बिलकुल नहीं क्योंकि मेरा मानना यही है कि लक्ष्य सिर्फ दुखी चित में होता है। सिर्फ दुखी आदमी के पास लक्ष्य होता है।

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