आजादी के बाद का युग - हिंदी सिनेमा जगत का स्वर्ण युग
आजादी के बाद का युग - हिंदी सिनेमा जगत का स्वर्ण युग
स्वतंत्रता के बाद देश ने सभी क्षेत्रों में तेजी से प्रगति की। लोगों ने पूरे आत्मविश्वास, भरपूर ऊर्जा और लगन से कार्य किया। फ़िल्म क्षेत्र में भी नये विचार और सृजनात्मकता आई। पचास के दशक में फिल्म उद्योग में सुधार लाने, उसका स्तर उठाने और उसे मजबूती प्रदान करने की लिए फ़िल्म जांच समिति नियुक्त की गई। समिति की सिफारिशों के अनुसार सरकार ने देश में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित करने की व्यवस्था की। अच्छी फ़िल्मों के निर्माण के लिए वित्त व्यवस्था करने के लिए फ़िल्म वित्त व्यवस्था करने के लिए फ़िल्म वित्त निगम की स्थापना हुई। फ़िल्म प्रदर्शन का प्रमाणपत्र देने में उदार रवैया अपनाया गया।
देश के बड़े नगरों में अच्छी फ़िल्मों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए फ़िल्म सोसाइटियों की स्थापना की गई। कोलकाता में सत्यजीत रे की अध्यक्षता में फ़िल्म सोसाइटी सन् 1947 से कार्य कर रही थी। इन सोसाइटियों को सहायता और सलाह देने के लिए सन् 1960 में सत्यजीत रे की अध्यक्षता में फेडरेशन ऑफ फ़िल्म्स् सोसाइटीज़ बनाई गई। श्रीमती इंदिरा गांधी इस फेडरेशन की उपाध्यक्ष थीं।
पुणे में फिल्म और टेलीविजन में प्रशिक्षण देने के लिए भारतीय फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान की स्थापना की गई। अब एक ऐसा संस्थान कोलकाता में भी सत्यजीत रे के नाम से स्थापित कर दिया गया है। बच्चों के लिए विशेष एवं अच्छी फ़िल्में बनाने की वास्ते बाल फ़िल्म समिति की स्थापना की गई। सरकार के इस योगदान से भारतीय फ़िल्मों का स्तर उठाने में महत्वपूर्ण सहायता मिली।
स्वतंत्रता के बाद के दो दशकों को फ़िल्म जगत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। इस दौरान शहरी जीवन पर अनेक अच्छी फ़िल्में बनीं। इनमें गुरुदत्त की 'प्यासा', 'कागज के फूल', राजकपूर की 'आवारा', 'श्री 420' और देवानंद की 'गाइड' उल्लेखनीय हैं। गुरुदत्त-वहीदा रहमान, राजकपूर-नरगिस, दिलीप कुमार-मधुबाला एवं देवानंद-सुरैया की जोड़ी फ़िल्म जगत पर छा गई।
कुछ समय के लिए सन् 1948 में चेन्नई हिंदी का केंद्र बना। जैमिनी स्टूडियो के एम.एस. वासन ने तमिल फ़िल्म 'चंद्रलेखा' को हिंदी में डब किया। इस पर उस समय 35 लाख रुपये की लागत आई, जो बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी। चेन्नई से ही उदय शंकर ने कल्पना बनाई। सुहाग रात और गुहस्थी भी वहीं बनीं।
सत्यजीत रे ने 'पाथेर पंचाली' बना कर विदेश में लोगों को चमत्कृत कर दिया था। उसके बाद अपराजिता और चमत्कृत कर दिया था। उसके बाद अपराजिता और अपूर संसार बनाकर उन्होंने इस परंपरा को जारी रखा। 'पाथेर पंचाली' को कांस फ़िल्म समारोह (1956) में पुरस्कृत किया गया। सत्यजीत रे ने सुप्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर आधारित हिंदी में एक अत्यंत सुंदर फ़िल्म बनाई। रे की अन्य फ़िल्में भी अत्यंत उच्चकोटि की है। रे की परंपरा को ऋत्विक घटक, मृणाल सेन और बांग्ला निर्देशकों ने जारी रखा।
विदेशी आलोचकों का कहना था कि भारत में अच्छी फ़िल्में केवल बंगाल में बनाई जाती हैं। कन्नड़ निर्देशक एम.एस. सथ्यू ने विभाजन की त्रासदी पर 'गर्म हवा' फ़िल्म बनाई। बलराज साहनी को भावपूर्ण अभिनय और सथ्यू के कुशल निर्देशन में निर्मित इस फ़िल्म में विभाजन के वातावरण, सांप्रदायिक द्वेष और तनाव के साथ यह दिखाया गया था कि विभाजन ने किस प्रकार लोगों की खुशियों को समाप्त करने के साथ उनके परिवार को अस्त-व्यस्त कर दिया।
इस फ़िल्म के साथ गिरीश कर्नाड-गोविंद निहलानी की फ़िल्म 'अंकुर' ने विदेशी आलोचकों को अपनी राय बदलने को मजबूर किया। तेलुगु में पी. आर. रेड्डी की फ़िल्म 'संस्कार' (1970) भी इसी श्रेणी की थी। इसमें जाति व्यवस्था को चुनौती दी गई थी। इसपर एक वर्ष तक प्रतिबंध भी लगा था।
__'कन्नड़ चोमन ड्डी' (1975) और 'घटश्राद' (1956) भी अत्यंत उच्चकोटि की फिल्में थीं। 'घटश्राद' में एक अनैतिक ब्राह्मण विधवा के जाति निष्कासन का चित्रण था। इसे वर्ष की सर्वोत्तम फिल्म का राष्ट्रीय परस्कार मिला। केरल में अडूर गोपाल कृष्णन ने लीक से हटकर 'स्वयंवरम्' नामक फिल्म बनाई। इसे भी वर्ष की सर्वोत्तम फिल्म का परस्कार मिला। उनकी अगली फिल्म 'कोडियोत्तम' को भी अनेक पुरस्कार मिले। जी. अरविंदम की पहली फिल्म 'उत्तरायणन' (1947) ने उन्हें सर्वोत्तम निदेशकों की कतार में बिठा दिया। उनकी अगली फिल्म 'कांचन सीता' और 'थम्पू' ने उनकी प्रसिद्धि में चार चांद लगा दिए। 'थम्पू' लंदन फ़िल्म समारोह में प्रदर्शित की गई। लंदन टाइम्स के डेविड रोबिन्सन ने इस फ़िल्म को जादुई गुणों से युक्त पाया।
इस दौरान दो भाइयों के बिछुड़ने और मिलने की कथा पर 50 से अधिक पारिवारिक फ़िल्में बनीं। इस तरह की फ़िल्मों में 'अमर अकबर एन्थनी' ने बहुत लोकप्रियता हासिल की तथा काफी धन बटोरा। अनेक भावना प्रधान नाटकीय फ़िल्में भी बनीं। अंतरजातीय विवादों पर भी अनेक फ़िल्में बनीं। इनमें 'चंडीदास', 'सुजाता' और 'चार दिल चार राहें उल्लेखनीय हैं। गोविंद निहलानी की फ़िल्म 'अर्धसत्य' में हिंसा और पुलिस की अमानवीयता का यथार्थ चित्रण है।
____ अगले कुछ वर्षों के दौरान मनोरंजन प्रधान प्रेम कथाएं और मारधाड़ दोनों किस्म की फ़िल्में बनाई गईं। राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, शर्मिला टैगोर, मुमताज और लीना चंद्रावरकर ने प्रेम कथाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण अभिनय किया। अमिताभ बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती ने मारधाड़ वाली फ़िल्मों में अपने उत्कृष्ट अभिनय से नयी शैली की फिल्मों को जन्म दिया। इस वर्ग की फ़िल्म 'शोले' ने बॉक्स ऑफिस और जनता के दिलों, दोनों जगह राज किया।

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