प्रश्न-- ओशो, आप तो बहुत घूमते हैं। आपको लगता है कम्युनिकेट करना आसान है। आपको इस देश में आज इंटेलेक्चुअल स्टैंडर्ड क्या लगता है?
प्रश्न--आप तो बहुत घूमते हैं। आपको लगता है कम्युनिकेट करना आसान है। आपको इस देश में आज इंटेलेक्चुअल स्टैंडर्ड क्या लगता है?
बहुत कम है। लेकिन बहुत कम होने का कारण यह नहीं है कि बुद्धिमान लोग मुल्क में बहुत कम हैं। असल में बहुत गलती हो गयी। शिक्षित आदमी बुद्धिमान समझा जा रहा है, यह दिक्कत हो गयी है, और हम उसी में खोजते हैं। बुद्धिमान , एजुकेटेड और इंटेलिजेन्स को हम इकटठा माने हए हैं, कि कोई आदमी शिक्षित है ठीक से, डिग्री है उसके पास, तो वह बुद्धिमान होगा। यह जरूरी नहीं है, डिग्री जरूरी नहीं है यह नहीं कह रहा। मैं यह कह रहा हूं कि डिग्री होने से आदमी इंटलिजेंट हो, यह जरूरी नहीं है। बल्कि सच यह है कि डिग्री पाने का हमारा जो रास्ता है, उसमें इंटेलिजेंट आदमी पिछड़ जाएगा, स्टुपिड आगे हो जाएगा। हमारा जो रास्ता है, वह इसी ढंग का है। क्योंकि हमारी सारी शिक्षा बहुत बहरे में स्मृति की परीक्षा है, बुद्धिमत्ता की नहीं। और बुद्धिमान आदमी जो है, वह बहत जल्दी भूलता है। और बुद्धिहीन आदमी जो है, वह चीजों को पकड़ लेता है, और कभी नहीं छोड़ता है। और पकड़े इसलिए रखते हैं कि नए समझने का तो उपाय नहीं है, यही उसकी संपत्ति है। बुद्धिमान आदमी समझता है और छोड़ देता है। क्योंकि क्या पकड़ना है? कल जब फिर सामने जिंदगी हो, तो फिर बुद्धिमता काम कर लेगी। तो बुद्धिमान स्मृति को इकट्ठा नहीं करता है, बुद्ध स्मृति इकट्ठी करता है। और स्मृति का जो प्रशिक्षण है, उसमें हम खोजने जाते हैं कि इंटेलिजेंट आदमी कहां है? तो शिक्षित आदमी जरूरी रूप से बुद्धिमान आदमी नहीं है। लेकिन, अगर हम यह श्रम छोड़ दें, और सहज आदमी में खोजने चलें, तो बुद्धिमान लोग दिखाई पड़ेंगे।
कभी गांव में जिसको हम एक निपट गंवार कहेंगे, वह बुद्धिमान हो सकता है। लेकिन जो मेजरमेंट हैं, हो सकता है वह पकड़ में न आ सकें, क्योंकि हमने मेजरमेंट गलत बना रखे हैं। इसमें उसकी गलती नहीं है। बुद्धिमता तो बहत है, लेकिन शिक्षित होने की बुद्धिमत्ता समझे, तब फिर कठिनाई पैदा हो जाती है; और वैसे आदमी से, क्योंकि बुद्धिमान के भी बहुत रूप हैं। अक्सर यह होता है कि जो मेरी बुद्धिमता है, वैसे आदमी को मैं बुद्धिमान समझ पाता हूं। और बुद्धि मता की बहुत दिशाएं हैं, बहुत आयाम हैं, बहुत डायमेंशंस हैं। यानी बुद्धिमत्ता कोई ऐसी चीज नहीं है कि एक ही तरह की हो। एक पेंटर है। उसके पास एक तरह की विजडम है, बुद्धिमता है। अगर गणितज्ञ से उसकी मुलाकात हो, तो गणितज्ञ समझ सकता है कि यह आदमी इटेलिजेंट नहीं है। क्योंकि गणितज्ञ के पास एक तरह की बुद्धिमत्ता है, जहां दो चार ही होते हैं। जहां सब बंधा हुआ फिक्स्ड है। पेंटर की बात बहुत भिन्न है।

No comments