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    भारतीय सिनेमा जगत में अस्सी और नब्बे का दशक - लोकप्रिय मुंबइयाँ फिल्मों का दौर


    भारतीय सिनेमा जगत में अस्सी और नब्बे का दशक - लोकप्रिय मुंबइयाँ फिल्मों का दौर

    अस्सी और नब्बे के दशक में मुंबइया सिनेमा पर व्यावसायिकता का नशा इस कदर छापा गया कि फ़ॉर्मूला फ़िल्में फ़िल्मकारों के लिए मुनाफा कमाने का सबसे बड़ा हथियार बन गईं। ऐसी फ़िल्मों के केंद्र में रोमांस, हिंसा, सेक्स और एक्शन को रखा जाता रहा है। कहने के लिए हर फ़िल्म में कोई न कोई सामाजिक संदेश देने की औपारिकता निभाई जाती है लेकिन इनका मकसद महज पैसा कमाना है। ऐसे फ़िल्मों ने खासकर युवाओं के मन में बहुत गलत प्रभाव छोड़ा है। नब्बे के दशक में जनता की रुचि एक बार फिर पारिवारिक फ़िल्मों की ओर मुड़ गई। इस मांग को पूरा करने के लिए मैंने प्यार किया, हम आपके हैं कौन और दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया गया।

    मुम्बइयाँ फ़िल्मों का दौर

    बाजारवाद और व्यावसायिकता के दबाव में समानांतर या कला फ़िल्मों का दौर अस्सी के दशक में ही खत्म होने लगा। एक बार फिर लोकप्रिय मुंबइयाँ फ़िल्में छाने लगीं। दरअसल, हिंदी सिनेमा पर शुरू से ही पॉपुलर या लोकप्रिय फ़िल्मों का दबदबा रहा है। कला फ़िल्मों को सामानांतर सिनेमा इसलिए भी कहा गया क्योंकि वे अपनी अंतरवस्तु में लोकप्रिय फ़िल्मों के समानांतर चलती थीं। कला फ़िल्मों के कमजोर पड़ने के साथ एक बार फिर पॉपुलर या लोकप्रिय सिनेमा हावी हो गया और तकनीक कथानक पर भारी पड़ने लगी।

    भारतीय सिनेमा में पारिवारिक फिल्मों की भी एक धारा लगातार चलती रही है। हलके-फुलके हास्य और एक आम आदमी के परिवार की खट्टी-मीठी कहानी पर बनी इन साफ़-सुथरी फ़िल्मों को भी खूब पसंद किया गया। लोकप्रिय और पारिवारिक फ़िल्मों की पहुँच गाँव और शहर के साधारण दर्शकों तक रहती आई है। इस तरह की फ़िल्मों में दर्शकों को बाँधने वाला कथानक, रोजमर्रा की समस्याएँ, मधुर संगीत, पारंपरिक नृत्य और संस्कृति के कई आयाम दिखाई देते हैं। इस धारा के फ़िल्मकारों में राज कपूर, गुरुदत्त, बिमल राय, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी जैसे कई नाम हैं।

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