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    अपनी बुद्धि को हम कसौटी बना लेते हैं, दूसरा आदमी उस कसौटी पर ठीक नहीं बैठता - ओशो

     
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    अपनी बुद्धि को हम कसौटी बना लेते हैं, दूसरा आदमी उस कसौटी पर ठीक नहीं बैठता - ओशो 

    वानगाग का एक चित्र है। उसने दरख्त उतने बड़े बनाए हैं कि चौखटे के पर निकल गए हैं। पेंटिंग छोटी पड़ गयी है, और पेंटिंग का आकाश भी छोटा पड़ गया है, वह दरख्तों के पार चले जा रहे हैं, और सूरज वगैरह इतने छोटे-छोटे कोने में पड़े हैं कि जिनकी कोई हैसियत नहीं। उसका एक मित्र उसे देखने आया है। उस मित्र ने कहा कि यह क्या पागलपन है? दरख्त इतने बड़े और सूरज इतना सा? इसमें कोई गणित भी तो हो, यह कैसा गणित है? दरख्त इतना बड़ा सूरज इतना सा? तुम्हें प्रपोर्शन का, अन्पात का कुछ खयाल नहीं है? अनुपात की जो भाषा है, वह गणित की भाषा है। प्रपोशन की जो भाषा है, वह गणित की भाषा है। तो उस चित्रकार ने कहा, मैं कोई गणितज्ञ नहीं हैं, और सूरज ने कोई गणित से सहमत होने को ठेका ले लिया है? मैंने तो कोई और ही बातें चित्रित की है। गणित से इसको कोई लेना-देना नहीं। दरख्तों को कभी भी ऐसा नहीं देख पाया। 

    मैं दरख्तों को सदा ऐसा ही देख पाया है कि दरख्त जो हैं, वे पृथ्वी की आकांक्षाएं हैं, आकाश को छने की। एम्बीशंस हैं पृथ्वी का। तो पृथ्वी अभी तक जीत नहीं पायी है, लेकिन हमें क्या बात है? यह जो आदमी है, इसको गणितज्ञ कहेगा, ठीक है, फिजूल हुआ यह! यह नापना था, तौलना था। नाप तौल की एक दुनिया है, वहां की यह बुद्धिमता है। लेकिन एक और प्रकार की बुद्धिमत्ता होती है। अब एक संगीतज्ञ है, उसकी और तरह की बुद्धिमता है। एक तार्किक है, उसकी और तरह की बुद्धिमता है। एक प्रेमी है, उसकी और तरह की बुद्धिमता है। और एक किसान है, उसकी और तरह की बुद्धिमता है। एक मिट्टी खोदने वाले है, उसकी और तरह की बुद्धिमता है। लेकिन, सच तो यह है कि जितने तरह के लोग हैं, उतनी तरह की बुद्धिमताएं हैं। और हम जब भी तौलने जाते हैं, तो अपनी बुद्धि को हम कसौटी बना लेते हैं। वह दूसरा आदमी उस कसौटी पर नहीं बैठता; क्योंकि वह दूसरा आदमी हमारे जैसा नहीं है। तब कठिनाई हो जाती

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