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    जब भी सृजन शक्ति ठहर जाती है, तो वह विध्वंस बन जाती है - ओशो

    Whenever-the-power-of-creation-stops-it-becomes-destruction---Osho


    जब भी सृजन शक्ति ठहर जाती है, तो वह विध्वंस बन जाती है -  ओशो 

    जो भी सोचा जाता है, वह किसी न किसी रूप से हो सकता है। वह सोचा जा सकता है न! तो वह हो भी सकता है। यह दूसरी बात है कि कितना फासला लगे, कितनी कठिनाई हो, कितनी मुश्किल हो। अब तो मुझे लग रहा है कि जो मैं कह रहा हूं, वह बहुत शीघ्रता से हो सकता है। क्योंकि सारी दुनिया में जो कुंठा है, वह है ही इसलिए थक अधिकतम लोगों को स्वयं होने का मौका मिल नहीं पाता। और कोई कारण नहीं है। एंग्विश जो है आज की पीढ़ी का, सारा युग, सारे जगत का, वह जो परेशान है, बेचैनी है, वह बेचैनी अब भौतिक नहीं है। गरीब मुल्कों को छोड़ दें, वहां की बेचैनी और है। वह बेचैनी अब एकदम भौतिक नहीं है। अब वह बेचैनी बहुत गहरे अर्थों में आत्मिक हो गयी है कि हर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को खोज लेने के लिए आतुर हो उठा है। यह आतुरता इतनी तीव्र है कि अगर उसे मौका नहीं मिलता है, तो दुखी होगा, पछताएगा, आत्मघात करेगा, शराब पीएगा, मरेगा, कुछ करेगा, जहां से वह टूटेगा। 

    यह बड़ा महत्व का मामला है कि जो व्यक्ति कुछ सृजन कर सकता है, अगर सृजन न कर पाए, तो उसकी सारी शक्ति विध्वंस बनने ही वाली है। क्योंकि शक्ति के दो ही उपाय हैं--या तो वह सजनात्मक हो जाए, या विध्वंस मग लग जाए। अब भी सृजन शक्ति ठहर जाती है, तो वह विध्वंस बन जाती है। इसलिए मीडियाकर आदमी कभी विध्वंसक नहीं होता। जिसके पास प्रतिभा जैसी कोई चीज नहीं है बहुत, वह कभी विध्वंसक नहीं होता! क्योंकि विध्वंस के लिए सृजनात्मक शक्ति चाहिए ही और जब वह फ्रस्ट्रेट होती है, रुकती है दबाव पड़ता है टूट जाती है तो वह फोड़ने लगती है, मिटाने लगती है--जो बना सकती थी, वह मिटाने लगती है। तो ऐसी स्थिति जो बन गयी है, उसे देखकर लगता है कि हम उस दबाव के करीब पहुंच गए हैं, जहां कठिनाई व्यक्ति की नहीं रह गयी है, जहां सामूहिक रूप से व्यक्ति कठिनाई में पड़ रहे हैं। तो इस बात की संभावना है कि दबाव में, चुनौती में, इस मरण के किनारे खड़े होने में, हो सकता है कि हम सारे ढांचे को तोड़ सके, जो बीते कल ने बनाया था। नया ढांचा दे सकें, यह कोई बहुत असंभव अब नहीं मालूम देता!

    -ओशो 

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