सोचने की प्रक्रिया से प्रत्येक के भीतर चेतना उस जगह आनी शुरू होती है, जहां से दर्शन संभव है - ओशो
सोचने की प्रक्रिया से प्रत्येक के भीतर चेतना उस जगह आनी शुरू होती है, जहां से दर्शन संभव है - ओशो
यह-यह करो, और समाज करेगा। अब तक यही हुआ है। आज तक वही हुआ है कि एक आदमी तय करता है, दस आदमी तय करते हैं कि यह करने योग्य है, हमें फिकर यह करनी चाहिए कि वह विचार की शक्ति ज्यादा न हो, तो प्रोग्रेम देना पड़ता है। कोई आदमी तय करेगा कि यह-यह करो, और समाज करेगा। अब तक यही हुआ है। अब तक यही हुआ है कि एक आदमी तय करता है, दस आदमी तय लें। और एक-एक चीज संदिग्ध हो जाए, एक-एक चीज के संबंध में चिंतन शुरू हो जाए। मैं भी संदिग्ध रहूं। मैं कोई विश्वास का आधार बन जाऊं यह सवाल नहीं है। मैं भी संदिग्ध रहं, चिंतन चले, विचार चले, लोग सोचें। सोचने की प्रक्रिया से प्रत्येक के भीतर चेतना उस जगह आनी शुरू होती है, जहां से दर्शन संभव है, जहां से चीजें दिखाई देना शुरू हो जाती है और यह दिखाई देना पाजिटिव प्रोग्रेम को जन्म देता है।
-ओशो

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