स्वर्ग क्या है नरक क्या है?
स्वर्ग क्या है नरक क्या है?
स्वर्ग और नरक करनी के फल हैं, एक संत ने अपने शिष्य को समझाया पर शिष्य की समझ में बात चढ़ी नहीं। तब उसका उत्तर देने के लिए अगले दिन संत शिष्य को लेकर एक बहेलिए के पास पहुंचे। वहाँ जाकर देखा कि व्याध कुछ जंगल के निरीह पक्षी पकड़कर लाया था, वह उन्हें काट रहा था, उसे देखते ही शिष्य चिल्लाया-"महाराज! यहाँ तो नरक है, यहाँ से शीघ्र चलिए।"
संत बोले-"सचमुच इस बहेलिए ने इतने जीव मार डाले पर आज तक फूटी कौड़ी इससे न जुड़ी, न जुड़ेगी।कपड़ों तक के पैसे नहीं, इसके लिए यह संसार भी नरक है और परलोक में तो इतने मारे गए जीवों की तड़पती आत्माएँ इसे कष्ट देंगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं हो सकती।"
संत दूसरे दिन एक साधु की कुटी पर पधारे। शिष्य भी साथ थे, वहाँ जाकर देखा, साधु के पास है तो कुछ नहीं पर उनकी मस्ती का कुछ ठिकाना नहीं, बड़े संतुष्ट बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। संत ने कहा-"वत्स! यह साधु इस जीवन में कष्ट का, तपश्चर्या का जीवन जी रहे हैं तो भी मन में इतना आह्लाद-यह इस बात का प्रतीक है कि इन्हें पारलौकिक सुख तो निश्चय ही है।"
सायंकाल संत एक वेश्या के घर में प्रवेश करने लगे तो शिष्य चिल्लाया-"महाराज! यहाँ कहाँ?" संत बोले-"वत्स! यहाँ का वैभव भी देख लें। मनुष्य इस सांसारिक सुखोपभोग के लिए अपने शरीर, शील और चरित्र को भी जिस तरह बेचकर मौज उड़ाता है, पर शरीर का सौंदर्य नष्ट होते ही कोई पास नहीं आता, यह इस बात का प्रतीक है कि इसके लिए यह संसार स्वर्ग की तरह है पर अंत इसका वही है, जो इस बहेलिए का था।"
अंतिम दिन वे एक सद्गृहस्थ के घर रुके। गृहस्थ बड़ा परिश्रमी, संयमशील, नेक और ईमानदार था, सो सुख-समृद्धि की उसे कोई कमी नहीं थी, वरन वह बढ़ ही रही थी। संत ने कहा-"यह वह व्यक्ति है, जिसे इस पृथ्वी पर भी स्वर्ग है और परलोक में भी।"
शिष्य ने इस तत्त्व-ज्ञान को भली प्रकार समझ लिया कि स्वर्ग और नरक वस्तुतः करनी का फल है।

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