प्रश्न--आपने जो पुनर्जन्म की बातें की हैं, तो आपको भगवान बना देने की स्थिति आएगी और लोग समझेंगे कि वह तो बहुत बड़े आदमी हैं, अपने पूर्वजन्म की बातें समझते हैं।
प्रश्न--आपने जो पुनर्जन्म की बातें की हैं, तो आपको भगवान बना देने की स्थिति आएगी और लोग समझेंगे कि वह तो बहुत बड़े आदमी हैं, अपने पूर्वजन्म की बातें समझते हैं।
ओशो--आप अपने पेपर में यह भी देना कि यह बड़े आदमी नहीं है, और भगवान भी नहीं है और हर आदमी को सावधान रहना चाहिए कि ऐसी भूल न हो। देना चाहिए। मैं लड़ाई जारी रखूगा, कामनसेंड की ही तो लड़ाई है सारी की सारी। व लड़ाई जारी रखूगा।
प्रश्न--जो मत परिवर्तन में विश्वास रखते हैं ऐसे धर्म, और जो मत की संस्था पर विश्वास रखते हैं ऐसे धर्म, इन दोनों में कैसे संबंध होने चाहिए, क्योंकि एक ही आबादी दसरे से न बढ़ जाए और दूसरे की उससे न बढ़ जाए।
ओशो--उसकी चिंता राज्य को नहीं करनी चाहिए, इन दोनों के विचारकों को करनी चाहिए। इसका राज्य से कोई प्रयोजन नहीं है।
प्रश्न--बहुत विचारक बेईमान हैं।
ओशो--तो दूसरे को बेईमान होने की तैयारी करनी चाहिए, और क्या करेंगे आप? सवाल यह है कि जो ईसाइयत है, वह कन्वर्ट करने में लगी है। और राज्य कहता है कि हम किसी को स्वीकार नहीं करते हैं कि कौन ईसाई है, कौन मुसलमान है। लेकिन यह हक तो हर आदमी को है कि अपनी बात किसी को, दूसरे को समझाए। इसे तो राज्य नहीं रोक सकता। अगर दूसरा आदमी राजी होता है ईसाई होने को, तो राज्य नहीं रोक सकता। अगर दसरा धर्म कहता है कि इस भांति हमारी संख्या कम होती है, तो उसका कारण तुम्हारा न तो स्थिरता का सिद्धांत है कि उसे तुम बदलो, या कन्वर्ट करो। अगर तुम सोचते हो कि तुम्हारा सिद्धांत ठीक है, तो संख्या कम करने को राजी रहो। इसमें झगड़ा क्या है? लेकिन राज्य की ओर से बाधा देना गलत है। अगर राज्य किसी तरह रुकावट डालता है ईसाई को कि वह किसी को ईसाई बनाने से रोके, तो फिर राज्य ठीक अर्थों में धर्म निरपेक्ष नहीं है।
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