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    प्रश्न--ओशो ,ऐसा नहीं है कि लोग थक जाते हैं एक पर्टिकुलर ढंग से और एक वैल्यू, रेव्यूल्यूशन के बाद पैक हो जाते हैं? भाग्यवाद, फिर सामूहिक...

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    प्रश्न--ऐसा नहीं है कि लोग थक जाते हैं एक पर्टिकुलर ढंग से और एक वैल्यू, रेव्यूल्यूशन के बाद पैक हो जाते हैं? भाग्यवाद, फिर सामूहिक... 

    ओशो --बिलकुल थक जाते हैं। यह दूसरी बात है। क्योंकि पुराना एस्टाब्लिशमेंट सुव्यवस्थित था! बहुत डरा हुआ था, शांति से सोया हुआ था, तैयार था कोई बात न थी। यह क्रांतिकारी जो इतनी मुश्किल से सता में पहुंचता है और ताकत इसके हाथ में आती है, इतनी मुश्किल से कि छीने जाने के प्रति इतना सजग और डर जाता है कि सब तरह के रास्ते तोड़ देता है, कि कहीं से कुछ गड़बड़ न हो जाए तो, क्रांतिकारी तो हमेशा सत्ता में आने पर क्रांति विरोधी सिद्ध होता है। इसलिए मेरा मानना है कि ठीक-ठीक क्रांतिकारी कभी भी एस्टाब्लिशमेंट में जाने को राजी होता। मेरा मानना है कि क्रांति कोई ऐसी घटना नहीं है कि एक तिथि में घटती है, और फिर खत्म हो जाती है। 

            क्रांति एक सतत प्रक्रिया है, कॉन्सटेंट कंटिन्युटी है। यानी मैं ऐसा नहीं मानता कि १९१७ में फलां तारीख को क्रांति हो गयी रूस में, और फलां तारीख को चीन में, और फलां तारीख हिंदुस्तान में, और बस! दो तरह के समाज हैं। अभी तक का जो समा है, वह असल में स्थिति स्थापक है, एस्टाब्लिशमेंट वाला ही है। उस व्यवस्था में तो उसी व्यवस्था के भीतर क्रांति दबाव से निकल आती है, फिर नयी व्यवस्था निर्मित हो जाती है। अब तक कोई क्रांतिकारी समाज निर्मित नहीं हआ है। क्रांतिकारी समाज का मतलब यह है कि जिसमें क्रांति की कभी जरूरत न पड़ेगी, क्योंकि रोज क्रांति चलती ही रहेगी उसमें। यानी हम किसी भी दिन किसी भी चीज को एस्टाब्लिश्ड नहीं मान लेंगे, और रोज मौके रहेंगे प्रयोग के, और रोज हम बदलते रहेंगे। और जो हमने कल बनाया था, उसे मिटाने की हिम्मत हनी रखेंगे। तो, यह तो बिलकुल ठीक है! अब तक तो यही होता रहा है, और जागे भी यही हो सकता है! लेकिन वह बेमानी है अब। पांच हजार साल का अनुभव यह कहता है कि क्रांतियां सब असफल हुई हैं। कोई क्रांति सफल नहीं हुई, क्योंकि लगा कि सफल होती है, सहल होते ही लोग कि सब कुछ गड़बड़ हो गया! क्रांति खुद ही वह हो गई, तो उसका दुश्मन था! अब तो हमें क्रांति की प्रक्रिया पर फिकर करनी चाहिए क्रांति करने की नहीं!

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